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    ससुर से सीखी रेसिपी, खाने वालों की लगती है लाइन:जयपुर की मशहूर घी दाल, पीतल के बर्तन में डबल तड़का बढ़ाता है स्वाद

    8 months ago

    जयपुर में एक ऐसा ढाबा है, जहां घी दाल फ्राई खाने के लिए आम से लेकर खास लोग कतार में लगते हैं। यहां की दाल फ्राई इतनी फेमस है कि दो बार घी का तड़का लगाया जाता है और इसे पीतल के बर्तनों में बड़े ही पारंपरिक तरीके से पकाया जाता है। ये है राजापार्क स्थित पाली ढाबा। यह सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि चार दशकों से भी ज्यादा वक्त की मेहनत, स्वाद, परंपरा और परिवार की कहानी है। दामाद ने ससुर से रेसिपी सीखी और घी से डबल तड़का लगाकर ऐसा स्वाद परोसा कि लोग दीवाने हैं। राजस्थानी जायका की इस कड़ी में आपको करवाते हैं इस खास स्वाद से रूबरू... राजापार्क में बैठकर अमृतसर का स्वाद पाली ढाबा की सबसे खास बात है यहां का देसी अंदाज। लोग पेड़ की छांव में खाट पर बैठकर पंजाबी स्टाइल में खाने का इंतजार करना पसंद करते हैं। पंचवटी सर्किल स्थित ढाबे में आप जैसे ही एंटर होते हैं, देसी घी की महक आपको ललचा देगी। फिर तो खाने का इंतजार करना भी मुश्किल हो जाता है। सेलिब्रिटी से लेकर आम लोग तक इस ढाबे के स्वाद के दीवाने हैं। पंजाब और अमृतसर से जयपुर आने वाले मेहमान यहां बिना अपना नाम बताए खाना खाने आते हैं। वीकेंड पर (शनिवार और रविवार) पर तो भीड़ इतनी होती है कि लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ता है, लेकिन कोई शिकायत नहीं करता। महिला ने संभाली पिता की विरासत जिस स्वाद के लिए लोग ढाबे तक आते हैं, उसे संभाल रही हैं रमनजीत रेणु। पूरा मैनेजमेंट संभालने वाली रमनजीत कौर ने अपने पिता सरदार जसपाल सिंह पाली की विरासत को आगे बढ़ाया है। जसपाल सिंह का जन्म पाकिस्तान में हुआ था, लेकिन बंटवारे के बाद वो राजस्थान आ गए। सरदार जसपाल सिंह पाली ट्रांसपोर्ट कंपनी चलाया करते थे। अक्सर उनके पास पंजाब से लोग आया जाया करते थे। वे हमेशा पंजाबी स्वाद की डिमांड करते। ऐसे में जसपाल सिंह पाली ने जयपुर के ट्रांसपोर्ट नगर में 1985 में ढाबा शुरू किया। उनकी बेटी और पाली ढाबे की ओनर रमनजीत ने बताया- पापा के हाथों में जादू था। उन्हें कुकिंग का बहुत शौक था। ढाबे पर कुक रखे थे लेकिन उन्हें ट्रेनिंग वो खुद देते थे। स्वाद ऐसा कि लोग तारीफ किए बगैर नहीं रह पाते थे। कुछ ही समय में ढाबा मशहूर हो गया। ससुर से सीखी घी वाली दाल की रेसिपी रमनजीत कौर बताती हैं पिता के ढाबे के सामने ही देवेंद्र पाल सिंह स्पेयर पाट्‌र्स की दुकान चलाते थे। किस्मत का ऐसा कनेक्शन बैठा कि मेरी शादी देवेंद्र पाल सिंह से हुई। उनके कुकिंग के शौक को देखते हुए पति ने ही पिता की विरासत में मिले बिजनेस को संभाला। मेरे पिता ने ही पति को घी दाल की रेसिपी से लेकर पूरी कुकिंग सिखाई थी, ताकि वे ढाबे का असली स्वाद बरकरार रख सकें। रमनजीत बताती हैं- 2012 में पिता की मौत के बाद भाई रविंद्र सिंह ढाबा संभालने में सहज नहीं थे। ऐसे में हमने ट्रांसपोर्ट नगर से ढाबा शहर के बीचों बीच शिफ्ट किया। नॉनवेज से शुद्ध शाकाहारी फैमिली ढाबा खोलने का फैसला किया। राजापार्क में गली नंबर-3 पंचवटी सर्किल पर छोटा सा ढाबा शुरू किया। लोगों ने जब यहां स्वाद चखा तो दीवाने हो गए। धीरे-धीरे भीड़ बढ़ी और आज यह ढाबा 6 दुकानों में फैल चुका है। असली पंजाबी खाना देवेंद्र पाल सिंह ने बताया- हमारे यहां हर चीज देसी तरीके से बनती है। दाल, सब्जी, आलू, छोले सब पीतल के बर्तनों में पकते हैं। कुकर का इस्तेमाल नहीं करते। यहां की घी वाली दाल फ्राई सबसे ज्यादा पॉपुलर है। इसमें एक बार फ्राई करने के बाद ऊपर से फिर घी का दूसरा तड़का लगाया जाता है। इसके साथ मिस्सी रोटी या लच्छा पराठा परोसा जाता है। बाकी डिशेज में पनीर टिक्का मसाला, मलाई कोफ्ता, सेव टमाटर, पालक टमाटर, काजू करी और गट्टे की सब्जी शामिल है। सब कुछ पुराने सीक्रेट मसालों और रेसिपीज से तैयार होता है। रमनजीत कहती हैं- पापा का मानना था कि पंजाबी खाना तब तक अधूरा है जब तक उसमें घी की महक ना हो। इसलिए आज भी दाल में देसी घी का भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। आगे बढ़ने से पहले देते चलिए आसान से सवाल का जवाब.... अमृतसरी कुलचे बनाते हैं सिमरपाल सिंह पाली ढाबे के इस सफर में अब तीसरी पीढ़ी भी जुड़ गई है। रमनजीत और देवेंद्र के बेटे सिमरपाल सिंह खुद अमृतसरी कुलचे तैयार करते हैं। वो बताते हैं- हम अमृतसर के असली कुलचे जयपुर में लेकर आए हैं। हू-ब-हू वैसा स्वाद मिले, इसलिए वे खुद इसे तैयार करते हैं। इन कुलचों को भी पीतल के बर्तनों में तैयार छोले, इमली-प्याज की चटनी और रायते के साथ सर्व किया जाता है। यहां हर कस्टमर फैमिली की तरह जुड़ता है रमनजीत बताती हैं- चाहे कितनी भी भीड़ हो, मैं हर कस्टमर से मिलती हूं, उनका रिस्पॉन्स लेती हूं। यहां आने वाले लोग अब हमारे परिवार की तरह हैं। यही वजह है कि बिना किसी ब्रांच या फ्रेंचाइजी के सिर्फ एक ढाबा पूरे शहर में अपनी पहचान बना चुका है। अमृतसर के रहने वाले संदीप ने कहते हैं- मैं गुरुग्राम में नौकरी करता हूं। जब भी जयपुर आता हूं, इस ढाबे पर जरूर आता हूं। मुझे पता है कि असली अमृतसरी कुलचे का स्वाद कैसा होता है और वो कहां मिलता है। परनीत बताती हैं कि ढाबे की ओनर रमनजीत काफी फैमिलियर हैं। यहां आकर लगता नहीं कि किसी ढाबे में आए हैं। मुझे यहां घी दाल और गट्टा करी बहुत पसंद है। जयपुर की अनुपमा कहती हैं- वे हफ्ते में कम से कम 2 दिन यहां आकर खाना खाती हैं। घर जैसा खाना और माहौल का तो कहना ही क्या। पिछले राजस्थानी जायका में पूछे गए प्रश्न का सही उत्तर ये है उदयपुर का ओपन समोसा…यह नाम सुनकर आपको लग रहा होगा की यह कैसा समोसा है? सच तो यह है कि उदयपुर शहर की एक संकरी गली में करीब 62 साल पुराने छोटे से रेस्टोरेंट में यह समोसा खाने वाले बाजार की मशहूर दुकानें छोड़कर पहुंचते हैं। उदयपुर शहर के बड़ा बाजार में पारख जी के कोटे के सामने एक गली जाती है जिसका नाम है सिंघटवाड़िया स्ट्रीट। बस इसी में अंदर जाते ही रूपजी रेस्टोरेंट में यह समोसा मिलता है...(CLICK कर पूरा पढ़ें)
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