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    भानगढ़ का रहस्य

    1 year ago

    कहानी: भानगढ़ का रहस्य

    जयपुर विश्वविद्यालय का एक होशियार छात्र आरव इतिहास में रिसर्च कर रहा था। उसकी दिलचस्पी भारत की प्राचीन और रहस्यमयी जगहों में थी। एक दिन उसने तय किया कि वह भानगढ़ किले पर फील्ड स्टडी करेगा।

    सुबह-सुबह वह अपने कैमरे और नोटबुक के साथ किले पहुँचा। दिनभर वह वहाँ की संरचना, पत्थरों पर खुदे शिलालेख और पुरानी कहानियाँ रिकॉर्ड करता रहा। लेकिन उसे असली झटका शाम होते ही लगा। जैसे ही सूरज ढलने लगा, एक बूढ़े चौकीदार ने उसे चेतावनी दी:
    "सूरज ढलने से पहले यहाँ से चले जाना बेटा, ये जगह रात में ज़िंदा नहीं रहती।"

    आरव ने इसे एक लोककथा समझ कर अनदेखा कर दिया और रिसर्च में जुटा रहा। रात के करीब 8 बजे, जब वह किले के सबसे अंदरूनी हिस्से में पहुँचा, तभी उसे लगा जैसे किसी ने उसे पीछे से छुआ हो। उसने पलटकर देखा, कोई नहीं था। फिर अचानक चारों ओर ठंडी हवा चलने लगी, और मंदिर की घंटियाँ अपने आप बजने लगीं।

    डर के मारे वह भागने लगा, लेकिन जैसे-जैसे वह बाहर की ओर बढ़ा, ऐसा लगा जैसे किसी अदृश्य ताक़त ने उसके पैरों में जकड़न डाल दी हो। किसी तरह वह गिरता-पड़ता बाहर पहुँचा और वहीं बेहोश हो गया।

    सुबह गाँव वालों ने उसे किले के गेट पर पाया। होश में आने पर आरव एक ही बात बार-बार कहता रहा –
    "वो मुझे छोड़ नहीं रही... वो अभी भी अंदर है..."

    उसके बाद आरव ने अपनी रिसर्च अधूरी छोड़ दी और फिर कभी भानगढ़ नहीं गया। लेकिन उसके द्वारा लिखे नोट्स आज भी विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में सुरक्षित हैं – एक अधूरी कहानी की तरह, जो शायद कभी पूरी नहीं होगी।

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